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आखिर Maharashtra Assembly में क्या हुआ?

 

भारत एक लोकतांत्रिक देश है. मतलब, यहां चुनाव होते हैं और लोग अपना वोट देकर अपने लिए नेता चुनते हैं. लेकिन ये सब इतना आसान नहीं है.

एक नेता से लेकर मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बनने की लंबी चौड़ी प्रक्रियाएं होती हैं. वैसे तो यह प्रक्रिया नियमों व कानूनों में लिखित है लेकिन सरकारें जब चाहे जैसे चाहे इन्हें अपनी मर्जी से तोड़ मरोड़ सकती हैं.

महाराष्ट्र (Maharashtra Assembly) में भी कुछ ऐसा ही हुआ है. आइए आसान भाषा में समझते हैं कि ऐसा क्या हो गया जिसने पूरे देश में बवाल मचा रखा है.

 

महाराष्ट्र में अक्टूबर माह में चुनाव हुए. महाराष्ट्र चुनावों में चार प्रमुख पार्टियां रही जिन्होंने चुनाव लड़े. बीजेपी, कांग्रेस, शिवसेना और एनसीपी.

कमाल की बात यह रही कि चारों पार्टियों ने अलग-अलग चुनाव नहीं लड़ा बल्कि दो-दो पार्टियों ने आपस में गठबंधन बनाकर इस चुनाव को लड़ा.

गठबंधन था बीजेपी और शिवसेना का कांग्रेस और एनसीपी का.

क्योंकि महाराष्ट्र में पहले से बीजेपी और शिवसेना की सरकार थी इसलिए सभी को लग रहा था कि वही दोबारा से जीतने वाली है. हुआ भी कुछ ऐसा ही बीजेपी और शिवसेना के गठबंधन को जनता का साफ बहुमत मिला. इतने में वो सरकार बना सकते थे.

 

लेकिन शिवसेना ने चुनाव जीतने के बाद अपनी कुछ डिमांड सामने रखी.

शिवसेना ने डिमांड रखी कि उन्हें भी ढाई साल के लिए अपना मुख्यमंत्री चाहिए.

उन्होंने यह भी कहा कि इस बारे में उनकी बीजेपी से चुनावों से पहले ही बात हो चुकी थी.

लेकिन बीजेपी इससे पूरी तरह मुकर गई और कहा कि हम इस तरह की कोई भी मांग पूरी नहीं कर सकते.

 

हालांकि बीजेपी की सीटें शिवसेना से 2 गुना ज्यादा थी लेकिन फिर भी वह बिना शिवसेना की मदद के सरकार तो नहीं बना सकती थी. 

 

अब शिवसेना ने बीजेपी के साथ धोखा करना चाहा.

जैसा कि मैंने शुरू में बताया कि चार प्रमुख पार्टियां थी तो शिवसेना ने बाकी की दो पार्टियों के साथ गठबंधन बनाकर सरकार बनाने की सोची. हालात कुछ ऐसे थे कि अगर शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी आपस में गठबंधन बना ले तो सरकार बनाई जा सकती थी.

इस समीकरण को लेकर काफी बैठकें हुईं, काफी मुलाकातें हुईं और अलग-अलग तरह की डिमांड रखी गई. यह एक काफी मजाक की स्थिति थी कि 20 दिनों के अंतराल के बाद भी यह लोग आपस में सरकार बनाने को लेकर कोई सहमति नहीं जता पाए.

 

जब काफी दिनों तक सरकार नहीं बनी तो इसके बाद महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया,

और सभी पार्टियों को सरकार बनाने के लिए 6 महीने का समय दिया गया.

अगर 6 महीने में सरकार नहीं बनती तो चुनाव दोबारा करवाने पड़ते.

 

शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस की बैठकों के बाद 22 नवंबर तक यह साफ हो चुका था कि गठबंधन की सरकार बनने जा रही है जिसमें मुख्यमंत्री शिवसेना से होगा.

लेकिन 23 नवंबर को जब तक देशवासी नींद से जागे, तब तक बीजेपी के देवेन्द्र फड़णवीस मुख्यमंत्री की शपथ ले चुके थे. ना कोई शोर, न कोई बाजा, बस आधी रात को ऐसा खेल चलाया कि सुबह तक सरकार ही बन गई बीजेपी की.

 

ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि एनसीपी पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने 35 विधायकों को साथ लेकर बीजेपी को रातोंरात समर्थन दे दिया. बीजेपी के पास सरकार बनाने के लिए काफी विधायक हो गए तो उन्होंने राज्यपाल को रात ही में उठाकर सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया. 

राष्ट्रपति शासन भी रात में ही हटा दिया गया, राज्यपाल ने सभी विधायकों की मंजूरी भी ले ली और सारी औपचारिक प्रक्रियाएं यानी फॉरमेलिटीज़ एक ही रात में निपटा दी गई.

कांग्रेस और देश के कुछ अन्य लोगों का दावा है कि ये हरकत लोकतंत्र के खिलाफ है और सरासर गलत है.

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अब ऐसा नहीं है कि सरकार बन गई है. अभी सरकार को फ्लोर टेस्ट से होकर गुजरना बाकी है. यानी विधानसभा के सदन में अपना बहुमत पेश करना पड़ेगा. कम से कम 145 विधायकों को अपने साथ लाना पड़ेगा. अगर ऐसा नहीं कर पाए तो सरकार फिर से गिर जाएगी.

यानी दोबारा राष्ट्रपति शासन लगेगा. या फिर दूसरी पार्टी को सरकार बनाने का मौका दिया जाएगा. 

 

शरद पवार बीजेपी को समर्थन देने के बिल्कुल मूड में नहीं हैं. बल्कि उन्हें तो उनके ही भतीजे अजीत पवार ने धोखा दिया है, जिसे बीजेपी ने सरकार का उप-मुख्यमंत्री बनाया है.

खबर ये भी है कि अजित पवार ने 26 नवंबर को उप-मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया है.

 

अब 27 नवंबर को सरकार का फ्लोर टेस्ट देखने लायक होगा !!!

 

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